वरिष्ठ राजनेता कल्याण सिंह (Kalyan Singh) भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल होते ही मुश्किल में फंस गए हैं. बाबरी विध्वंस (Babri demolition) मामले में सीबीआई ने कोर्ट में अर्जी दाखिल कर 87 वर्षीय कल्याण सिंह (Kalyan Singh) को तलब करने की अपील की है. दरअसल, कल्याण सिंह (Kalyan Singh) राजस्थान के राज्यपाल थे, यह संवैधानिक पद है, जिसके चलते सीबीआई उनके खिलाफ अर्जी नहीं दाखिल कर पा रही थी. राज्यपाल के पद से हटने के बाद सोमवार को कल्याण सिंह (Kalyan Singh) ने एक बार फिर से बीजेपी ज्वाइन कर लिया, जिसके बाद सीबीआई ने उनके खिलाफ अर्जी दाखिल कर दी. इसी मामले में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, महंत नृत्यगोपाल दास जमानत पर हैं.

कोर्ट ने पहले कहा था कि 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह (Kalyan Singh) को मुकदमे का सामना करने के लिए आरोपी के तौर पर बुलाया नहीं जा सकता, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत राज्यपालों को संवैधानिक छूट मिली हुई है.

संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों को उनके कार्यकाल के दौरान आपराधिक तथा दीवानी मामलों से छूट प्रदान की गई है. इसके अनुसार, कोई भी अदालत किसी भी मामले में राष्ट्रपति या राज्यपाल को समन जारी नहीं कर सकती.
मालूम हो कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद को कारसेवकों ने गिरा दिया था. उस समय उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और सत्ता के सिंहासन पर कल्याण सिंह (Kalyan Singh) मुख्यमंत्री थे, लेकिन उन्होंने बाबरी मस्जिद को टूटने से नहीं बचाया गया.

लालकृष्ण आडवाणी सितंबर 1990 में सोमनाथ से रथ लेकर मंदिर के लिए जनजागरण करने निकले थे. इससे मंदिर आंदोलन उग्र हुआ और बीजेपी में जान पड़ी. इसकी बुनियाद 1989 के आम-चुनावों में पड़ जाती है, जिसमें 9 साल पुरानी बीजेपी 2 सीटों से बढ़कर 85 पहुंच गई.


राममंदिर आंदोलन की देन थी कि 1991 में यूपी में बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी और कल्याण सिंह (Kalyan Singh) मुख्यमंत्री बने. 6 दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई. कल्याण सिंह (Kalyan Singh) मुख्यमंत्री थे और उन्हें इसके लिए एक दिन की सजा भी हुई. इस घटना के बाद यूपी की सत्ता से कल्याण सरकार बर्खास्त हो गई.