33 केवी ट्रांसमिशन लाइन मामले में हाईकोर्ट सख्त, केंद्र, राज्य और बिजली कंपनी को नोटिस
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और रायगढ़ जैसे घने वनों से घिरे अंचलों में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। बिलासपुर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र में, जो कि हाथियों के विचरण और उनके प्राकृतिक रहवास (एलीफेंट कॉरिडोर) के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है, बिना आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियों के 33 केवी (किलोवाट) की हाई-टेंशन ट्रांसमिशन बिजली लाइन का विस्तार किए जाने के गंभीर मामले को संज्ञान में लिया है।
अदालत ने इस मामले को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय, छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के वन व राजस्व विभाग और संबंधित बिजली वितरण कंपनी को कड़ा नोटिस जारी कर तत्काल जवाब तलब किया है। इसके साथ ही माननीय न्यायालय ने राज्य सरकार के विधि अधिकारियों के विशेष आग्रह पर जवाब प्रस्तुत करने के लिए एक सप्ताह की अतिरिक्त मोहलत भी प्रदान की है।
बिना वन विभाग की एनओसी के घने जंगलों और राजस्व भूमि पर धड़ल्ले से हुआ गैर-वानिकी निर्माण
बिलासपुर: उच्च न्यायालय के समक्ष पेश की गई जनहित याचिका में वन संरक्षण अधिनियम और पर्यावरणीय नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाए जाने के बेहद चौंकाने वाले आरोप लगाए गए हैं:
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लघु जल विद्युत परियोजना की आड़: याचिकाकर्ता के अनुसार धरमजयगढ़ विकासखंड के ग्राम भालूपखना में स्थापित धनबादा पावर की 7.50 मेगावाट क्षमता वाली एक निजी लघु जल विद्युत परियोजना का संचालन किया जा रहा है। इस परियोजना के लिए जो 33 केवी की विशाल ट्रांसमिशन लाइन बिछाई गई है, उसके लिए वन विभाग से कोई अनिवार्य वन डायवर्सन क्लीयरेंस (गैर-वानिकी गतिविधि की अनुमति) नहीं ली गई थी।
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अवैध रूप से बिछाई गई लाइन: नियमों के अनुसार वन क्षेत्र से किसी भी प्रकार की बिजली लाइन गुजारने से पहले केंद्र और राज्य के वन विभागों से विशेष तकनीकी और सुरक्षा अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है, जिसे इस मामले में दरकिनार कर दिया गया।
बड़ा खेल: वैधानिक मंजूरियों और भारी-भरकम टैक्स से बचने के लिए 11 केवी के खंभों पर टांग दी 33 केवी की हाई-टेंशन लाइन
बिलासपुर: इस पूरे मामले में याचिकाकर्ता ने सरकारी मशीनरी और बिजली कंपनी के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े किए हैं:
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बिजली खंभों का चतुराई से इस्तेमाल: धरमजयगढ़ के भालूपखना से लेकर चरखापारा तक पहले से स्थापित 11 केवी की ग्रामीण घरेलू बिजली लाइन के पुराने खंभों को बदलने और नवीनीकरण करने का कार्य छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (सीएसपीडीसीएल) द्वारा किया जा रहा था।
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अधिकारियों की कथित मिलीभगत: आरोप है कि बिजली विभाग के कुछ रसूखदार अधिकारियों और ठेकेदारों ने मिलीभगत कर नए लगाए गए 11 केवी के इन्हीं खंभों के ऊपर से चुपके से उस निजी जल विद्युत परियोजना की भारी-भरकम 33 केवी की ट्रांसमिशन लाइन भी गुजार दी। ऐसा इसलिए किया गया ताकि कंपनी को नए सिरे से वन भूमि का सर्वे न कराना पड़े, वन डायवर्सन के कड़े नियमों से बचा जा सके और भारी-भरकम सरकारी डायवर्सन शुल्क व सुरक्षा राशि की चोरी की जा सके।
मंजूरी की फाइलें सरकारी दफ्तरों में धूल फांकती रहीं, और वहां ठेकेदार ने काम भी पूरा कर दिया
बिलासपुर: याचिका में यह साफ तौर पर उजागर किया गया है कि नियम-कायदों को किस तरह ठेंगे पर रखा गया:
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पहले ही कर लिया काम: परियोजना के प्रबंधकों ने कानूनी कागजी खानापूर्ति दिखाने के लिए वन विभाग और जिला प्रशासन के समक्ष जमीन उपयोग की अनुमति के लिए आवेदन तो जमा किया था, लेकिन उन्होंने इस आवेदन पर अंतिम प्रशासनिक मुहर लगने का इंतजार तक नहीं किया।
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अंतिम स्वीकृति से पहले निर्माण: अंतिम सरकारी स्वीकृति और पर्यावरण विभाग की हरी झंडी मिलने से बहुत पहले ही ठेकेदारों ने जंगलों के भीतर ट्रांसमिशन लाइन खींचने और खंभे गाड़ने का काम पूरा कर लिया था। यह सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण कानून का खुला उल्लंघन है।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख; सभी प्रतिवादियों से मांगा हलफनामा, याचिकाकर्ता को मिला प्रतिउत्तर का अधिकार
बिलासपुर: मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष जब इस जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना:
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नोटिस किया गया स्वीकार: अदालत की ओर से जारी किए गए नोटिस को केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के अधिवक्ताओं ने कोर्ट रूम में ही स्वीकार कर लिया। इसके बाद राज्य सरकार के वकील ने इस गंभीर तकनीकी मामले पर विस्तृत और सटीक तथ्यात्मक जवाब तैयार करने के लिए अदालत से कुछ और समय की मांग की, जिसे स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने एक सप्ताह का समय दिया।
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निजी कंपनी का पक्ष: वहीं, दूसरी ओर बिजली लाइन बिछाने वाली निजी कंपनी ने अदालत को सूचित किया कि उनका पक्ष और प्रारंभिक जवाब पहले ही रिकॉर्ड पर लाया जा चुका है। इसे देखते हुए माननीय अदालत ने याचिकाकर्ता को कंपनी के उस जवाब के खिलाफ अपना काउंटर-एफिडेविट (प्रत्युत्तर) पेश करने की पूरी स्वतंत्रता प्रदान की है।
सुरक्षा राशि का विवाद: तकनीकी खामियों को दूर कर दोबारा न्याय की गुहार लगाने पहुंचा याचिकाकर्ता
बिलासपुर: इस पूरे कानूनी विवाद का एक पहलू यह भी है कि यह मामला पहली बार उच्च न्यायालय की दहलीज पर नहीं पहुंचा है:
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पिछली याचिका हुई थी खारिज: इससे पहले भी याचिकाकर्ता द्वारा इसी अवैध बिजली लाइन के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की गई थी। लेकिन उस वक्त सुरक्षा राशि (Security Deposit) जमा करने से छूट चाहने वाले एक तकनीकी आवेदन को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने बीते 7 मई 2026 को उस याचिका को तकनीकी रूप से खारिज (निरस्त) कर दिया था।
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नया कानूनी कदम: याचिकाकर्ता ने हतोत्साहित होने के बजाय सभी तकनीकी खामियों को पूरी तरह दुरुस्त किया और जनहित को सर्वोपरि रखते हुए दोबारा नए सिरे से यह याचिका दायर की। इसी नई याचिका को स्वीकार करते हुए अब बिलासपुर हाईकोर्ट ने मामले की गहराई से जांच करने के लिए सभी संबंधित पक्षों पर कानूनी शिकंजा कसा है।

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