कोरोना को महामारी घोषित करने के लगभग एक साल बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने आखिर मान लिया है कि कोरोना का वायरस हवा से भी फैल सकता है। WHO के अनुसार "वायरस खराब वेंटिलेशन या भीड़ वाली बंद जगहों में भी फैल सकता है, जहां लोग लंबे समय तक रहते हैं, क्योंकि एयरोसोल हवा में एक मीटर से भी ज्यादा दूर तक जा सकते हैं।" दरअसल, WHO ने कोरोना से जुड़े सवालों के जवाब अपडेट किए हैं। इनमें इस सवाल का जवाब भी शामिल है कि लोगों के बीच कोरोना कैसे फैलता है? माना जा रहा है कि इसके बाद कोरोना से बचने की नई गाइडलाइंस सामने आ सकती हैं। संगठन अब तक कहता आया था कि इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि कोरोना हवा से भी फैलता है।


कोरोना कैसे फैलता है? चीन में 2019 में कोरोना फैलने के बाद से ही इस सवाल पर भारी बहस होती रही है।

दरअसल, इस बहस के पीछे वैज्ञानिकों के बीच ड्रॉपलेट और एयरोसोल को लेकर मतभेद है। अब तक ज्यादातर वैज्ञानिकों का मानना था कि छींकते, खांसते, गाते या बोलते हुए इंसान की नाक या मुंह से जो छींट या बूंदें निकलती हैं वह ड्रापलेट होती हैं। यानी उनका साइज 5 माइक्रोमीटर से ज्यादा होता है। उनमें कोरोना वायरस होने पर भी वह अपने वजन के चलते दो मीटर से ज्यादा दूर नहीं जा पाते हैं। गुरुत्वाकर्षण के चलते नीचे गिर जाते हैं। यानी कोरोना हवा से नहीं फैलता है । एक माइक्रोमीटर एक मीटर का 10 लाखवां हिस्सा होता है।
वहीं, एक्सपर्ट्स के दूसरे समूह का कहना है कि मुंह और नाक से निकलने वाले छींटों का आकार 5 माइक्रोमीटर से कम भी हो सकता है और वह हवा के साथ बहकर दूर तक जा सकते हैं। यानी कोरोना वायरस हवा से भी फैल सकता है।

WHO ने जुलाई 2020 में कहा था, कोरोना वायरस के हवा से फैलने का कोई सबूत नहीं

कोरोना फैलने के शुरुआती महीनों में तो WHO ने सभी को मास्क पहनने के बजाय केवल संक्रमितों को मास्क पहनने की सलाह दी थी। जुलाई 2020 में स्वतंत्र हेल्थ एक्सपर्ट्स ने कहा था कि कोरोना वायरस हवा से भी फैलता है। उन्होंने WHO से कोरोना को हवा से फैलने वाली महामारी घोषित करने को कहा था। तब WHO की ओर से यह तो कहा गया कि कोरोना वायरस हवा से फैलता है, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, मगर जल्द ही संगठन ने कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं। जुलाई 2020 की गाइडलाइन में WHO इस बात पर कायम रहा कि कोरोना किसी संक्रमित से संपर्क में आने, उसके मुंह या नाक से निकलने वाले ड्रॉपलेट्स यानी वायरस युक्त बूंदों और फोमिटीज यानी कपड़े, बर्तन, फर्नीचर आदि पर मौजूद वायरस से फैलता है।


कोरोना फैलने की बहस में इसी साल अप्रैल में तब बड़ा मोड़ आया, जब वैज्ञानिकों के एक समूह ने मशहूर मेडिकल जर्नल द लैंसेट में 10 सबूत के साथ दावा किया कि कोरोना वायरस हवा से भी फैलता है।

वहीं, अमेरिका में MIT यानी मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की स्टडी में दावा किया गया है कि 6 फीट सोशल डिस्टेंसिंग के नियम के कोई मायने नहीं हैं। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि छींकते या खांसते हुए मुंह या नाक से निकलने वाली ड्रॉपलेट्स इतनी छोटी होती हैं कि वे एयरोसोल बन जाती हैं। खासतौर पर बंद जगहों पर यह एक सुपर-स्प्रेडर का काम करते हैं। रिसर्च में अमेरिका, चीन और कोरिया में इस तरह कोरोना फैलने की कई घटनाओं का जिक्र किया गया था।

द लैंसेट में वैज्ञानिकों ने पेश किए थे 10 सबूत

मानव व्यवहार, बातचीत के तरीके, कमरों का आकार, वेंटिलेशन और दूसरी बातों के विश्लेषण से पता चलता है कि केवल ड्रॉपलेट्स और फोमिटीज यानी कपड़े, बर्तन, फर्नीचर आदि पर मौजूद वायरस से कोरोना इतनी तेजी से नहीं फैल सकता।
क्वारैंटाइन होटलों में इस बात के काफी रिकॉर्ड मिले कि बिना एक दूसरे से मिले या संपर्क में आए ही आस-पास के कमरों में ठहरे लोगों में एक दूसरे से संक्रमण फैला।
कोरोना के 33% से 59% मामले बिना लक्षण वाले संक्रमितों से फैलते हैं, जबकि वे छींकते और खांसते नहीं। यह इस बात का सबूत है कि कोरोना हवा से भी फैलता है।
कोरोना खुली जगह के मुकाबले बंद कमरों में ज्यादा तेजी से फैलता है। कमरों के खिड़की दरवाजे खोलने से फैलने की दर कम हो जाती है। मतलब कोरोना हवा से फैलता है।
अस्पतालों में होने वाले इंफेक्शन (nosocomial infections) PPE पहनने वाले हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स में भी मिले हैं। वजह यह कि उनके PPE ड्रॉपलेट से बचने के लिए तो डिजाइन किए गए, लेकिन एयरोसोल से बचने के लिए नहीं।
 

एक्सपर्ट्स ने कहा कि लैबोरेटरी में कोरोना वायरस को तीन घंटों तक हवा में तैरता देखा जा चुका है।

अस्पतालों और बिल्डिंगों में लगे एयर फिल्टर और डक्ट में भी कोरोना वायरस मिले हैं, ऐसी जगहों पर एयरोसोल के बिना वायरस नहीं पहुंच सकते।

पिंजरों में बंद जानवरों तक कोरोना पहुंचना यह बताता है कि वायरस हवा से भी फैलता है।

अब तक ऐसी कोई थ्योरी सामने नहीं आई तो इस बात को खारिज करे कि कोरोना वायरस हवा से नहीं फैलता।

कोरोना फैलने के दूसरे तरीकों जैसे नाक-मुंह से निकलने से वाले ड्रॉपलेट और फोमिटीज यानी कपड़ों, बर्तन, फर्नीचर आदि से फैलने के समर्थन में सीमित सबूत हैं।

कोरोना वायरस कैसे फैलता है? WHO के ताजा तीन कारण

मौजूदा सबूत बताते हैं कि वायरस मुख्य रूप से उन लोगों के बीच फैलता है जो एक-दूसरे से निकट संपर्क में होते हैं, आमतौर पर 1 मीटर (शॉर्ट रेंज) से कम दूर होते हैं।
वायरस खराब वेंटिलेशन या भीड़ वाली बंद जगहों में भी फैल सकता है, जहां लोग लंबे समय तक रहते हैं, क्योंकि एयरोसोल हवा में एक मीटर से भी ज्यादा दूर तक जा सकते हैं।
लोग उन सतहों को छूने से भी संक्रमित हो सकते हैं जो वायरस से दूषित हों और वे बिना हाथ साफ किए अपनी नाक, मुंह या आंख को छू लें।
WHO की गाइडलाइन में यह बदलाव क्यों खास है?

अब दुनिया भर में मान लिया जाएगा कि कोरोना वायरस हवा के जरिए एक मीटर या छह फीट से भी दूर जा सकता है।

एयरोसोल के जरिए कोरोना वायरस फैलने की बात मानने के बाद कोरोना से बचने के लिए नई गाइडलाइंस जोड़ी जा सकती हैं।

खासतौर पर दफ्तर, घर, स्कूल-कॉलेज और मॉल जैसी बंद जगहों को लेकर नई सलाह सामने आ सकती हैं।

भारत में कोविड 19 टास्क फोर्स के प्रमुख डॉ. वीके पॉल ने पिछले दिनों घर पर भी मास्क पहनने की सलाह दी थी। यह सलाह WHO की नई गाइडलाइन की तर्ज पर ही है, जिसमें कहा गया है कि बंद जगह में एयरोसोल के जरिए कोरोना फैल सकता है।

इसके जरिए यह भी समझा जा सकता है कि आखिर क्यों सोसाइटी या रेजिडेंशियल अपार्टमेंट में भारी संख्या में कोरोना केस मिल रहे हैं।