चंदा मामा की कहानी सुनकर बड़े होते हुए क्या हमने कभी सोचा था कि ये इकलौता चंद्रमा नहीं. लगभग 50 से ज्यादा सालों तक रिसर्च के बाद आखिरकार वैज्ञानिकों को धरती के पास दो अतिरिक्त चंद्रमा दिखे. हालांकि ये बात और है कि वे पूरी तरह से धूल से अटे हुए हैं और आम लोगों को दिखाई नहीं दे सकते. ये स्टडी सबसे पहले सितंबर 2018 को एक साइंस जर्नल Monthly Notices of the Royal Astronomical Society में आई, जिसमें वैज्ञानिकों ने दावा किया कि धरती के पास कुल तीन चंद्रमा हैं. यूरोपियन देश हंगरी की राजधानी बुदापेस्ट की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण यूनिवर्सिटी Eötvös Loránd University के वैज्ञानिकों की टीम लंबे समय से इसपर शोध में लगी हुई थी. दरअसल धरती से लगभग 250,000 मील की दूरी पर कुछ रहस्यमयी बादल दिखे. ये दूरी उतनी ही है, जितनी दूरी चंद्रमा की है. इन्हीं रहस्यमयी बादलों पर शोध में ये नतीजे दिखे.

कैसे हुई शुरुआत
इससे पहले से ही शोधकर्ताओं को धरती के आसपास कई साथी नजर आ रहे थे लेकिन रहस्यमयी बादलों का झुंड सबसे पहले 1961 में दिखा. पोलैंड के अंतरिक्षविज्ञानी Kazimierz Kordylewski ने सबसे पहले बादलों को देखा, हालांकि तब भी ये साफ नहीं था कि ये आखिर क्या हैं. यहां तक कि वैज्ञानिकों के बड़े समुदाय ने इसके होने पर सवाल उठाए. बाद में इन बादलों को इसी वैज्ञानिक के नाम पर Kordylewski बादल नाम दिया गया.

हंगरी की शोधकर्ता Judit Slíz-Balogh कहती हैं कि पृथ्वी से दूर ठीक चंद्रमा के आसपास होने और धूल से बना होने की वजह से इन्हें देखा जाना काफी मुश्किल रहा. बाद में पक्का हो सका कि धरती के पास चंद्रमा के ही बगल में आभासी उपग्रह (pseudo-satellite) हैं.


कैसे हैं ये धूलभरे चंद्रमा
नए निष्कर्षों के अनुसार, हर Kordylewski बादल लगभग 15 डिग्री लंबा-चौड़ा है. इसका वास्तविक आकार धरती से नौ गुना ज्यादा फैला हुआ है. बादल अपने-आप में विशाल हैं लेकिन उसमें पाए जाने वाले कण, जिनसे मिलकर बादल बना है, वे सिर्फ एक माइक्रोमीटर तक के हैं. सूर्य की किरणें इनसे परावर्तित होने पर इनसे काफी हल्की चमक निकलती है, जो जल्दी नजर में भी नहीं आ पाती है. बादलों के ये उपग्रह इतने कम चमकीले हैं कि इनपर लंबे समय तक वैज्ञानिकों की नजर ही नहीं गई. इनके सुपर फेंट होने को बताते हुए स्टडी के एक शोधकर्ता Gábor Horváth कहते हैं कि मंदाकिनी की रोशनी, तारों के प्रकाश, राशि मंडल के प्रकाश और आसमान के खुद के चमकीले होने के बीच Kordylewski बादलों को खोज पाना आसान नहीं था. अब खास तरह के उपग्रहीय कैमरों में पोलेराइजिंग फिल्टर लगाने के बाद आखिरकार अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को ये बादल दिख सके.

कई चंद्रमा वाला सिद्धांत

लंबे समय से वैज्ञानिक कहते रहे कि धरती के एक से ज्यादा चंद्रमा हो सकते हैं. चंद्रमा कहां हो सकते हैं, इसपर भी काफी स्टडी हुई. लैंग्रेन (Lagrange) पॉइंट के नाम से जाने जाने वाले ये कक्षीय धब्बे वे जगह हैं, जहां परिक्रमा करने वाले दो ऑब्जेक्ट्स का गुरुत्वाकर्षण संतुलित होता है, जैसे कि पृथ्वी और सूर्य. यहां पर ऑब्जेक्ट अपेक्षाकृत स्थिर होते हैं और चंद्रमा और पृथ्वी दोनों से एक तयशुदा दूरी पर बने रहते हैं. साल 1950 में अंतरिक्षविज्ञानी Kordylewski ने इन दो बिंदुओं को L4 और L5 नाम दिया. चंद्रमा की खोज के दौरान ही उन्हें बादलों के बने ये उपग्रह दिखे.

क्या मिल सकता है फायदा

धूमकेतु, उल्का या फिर राशिमंडल तक हमारा सौरमंडल असल में एक धूल से भरी जगह है. ग्रहों के बीच हर ओर बिखरे हुए धूल के कण दिखते हैं. हालांकि Kordylewski बादल उतने स्थिर नहीं हैं, बल्कि इनके आकार में लगातार बदलाव हो रहा है. वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे है कि इन बादलों पर अध्ययन और जानकारी जुटाना भविष्य में अंतरिक्ष के बारे में जानने में काफी फायदेमंद हो सकता है.

मिसाल के तौर पर कई स्पेस मिशन में Lagrange point को सैटेलाइट पार्किंग के लिए इस्तेमाल किया गया है. इन जगहों पर सैटेलाइट का ईंधन कम से कम इस्तेमाल होता है, जिससे ईंधन की काफी बचत हो जाती है.नासा के एक प्रोजेक्ट के तहत इसी साल (2020) के अंत में L2 पॉइंट के बारे में जानने की योजना है, हालांकि फिलहाल कोरोना के चलते इस बारे में कोई पुष्ट जानकारी नहीं है. अंतरिक्ष एजेंसियां भी इस बारे में प्लानिंग कर रही हैं कि कैसे इन दोनों पॉइंट्स को मंगल ग्रह के मिशन के दौरान इंटरप्लानेटरी हाइवे की तरह इस्तेमाल किया जा सके ताकि ईंधन की बचत हो. इस तरह से माना जा रहा है कि अंतरिक्ष में सुरक्षा की दृष्टि से इन दोनों बादलों यानी धूल से भरे चंद्रमा की गतिशीलता की जांच काफी अहम साबित हो सकती है.